Saturday, May 30, 2026

UJJWAL DISHA: मास्टर प्लान की ‘वाटर बॉडी’ पर खड़ा किया अवैध कमर्शियल साम्राज्य!

अंबाला |एक तरफ अंबाला का प्रशासन शहर को ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, तो दूसरी तरफ रसूखदारों की शह पर नियमों को ठेंगे पर रखकर अवैध साम्राज्यों का निर्माण जारी है। मामला फिल्म ‘खोसला का घोसला’ की पटकथा जैसा है, जहाँ सरकारी फाइलों में दर्ज हकीकत को सत्ता और पैसे के दम पर कुचला जा रहा है। आज हम उस सच का पर्दाफाश कर रहे हैं, जो मंजी साहिब गुरुद्वारे के ठीक सामने एक विशाल कमर्शियल कॉम्प्लेक्स की शक्ल में कानून की छाती पर खड़ा हो रहा है।

मास्टर प्लान में ‘वॉटर बॉडी’, धरातल पर कंक्रीट का जंगल

सबसे चौंकाने वाला खुलासा DTP (डिस्ट्रिक्ट टाउन प्लानर) के मास्टर प्लान के दस्तावेजों से हुआ है। कागजों के मुताबिक, जिस स्थान पर बलविंदर कौर और हरमन (मैनेजिंग डायरेक्टर) के नेतृत्व में करोड़ों का कमर्शियल प्रोजेक्ट तैयार हो रहा है, वह जगह कोई जमीन नहीं बल्कि एक ‘वाटर बॉडी’ (जल निकाय) है। नियमतः किसी भी वॉटर बॉडी पर निर्माण कार्य करना पर्यावरण और स्थानीय कानून का घोर उल्लंघन है। लेकिन यहाँ प्रशासन की नाक के नीचे न केवल जल निकाय को भरा गया, बल्कि उस पर अवैध निर्माण की नींव भी रख दी गई।

CLU और NOC के बिना ही खड़ा हो गया अवैध किला

नियमों के अनुसार, किसी भी कमर्शियल प्रोजेक्ट की शुरुआत से पहले CLU (चेंज ऑफ लैंड यूज) अनिवार्य है। इसके लिए टाउन एंड कंट्री प्लानिंग, अर्बन लोकल बॉडीज, फॉरेस्ट विभाग, NHAI और PWD जैसे महत्वपूर्ण विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लेना होता है। लेकिन इस प्रोजेक्ट के मामले में एक भी नियम का पालन नहीं किया गया।

प्रशासन की ‘मौन सहमति’ या भ्रष्टाचार का बड़ा खेल?

सवाल यह उठता है कि आखिर अंबाला के तमाम विभाग—NHAI, PWD, और अर्बन लोकल बॉडीज—इ

तनी कुंभकर्णी नींद क्यों सो रहे हैं? फॉरेस्ट अफसर की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बावजूद किसी भी अधिकारी ने निर्माण रोकने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाई? क्या यह मौन सहमति किसी बड़े वित्तीय भ्रष्टाचार की ओर इशारा कर रही है?

जब एक आम नागरिक अपनी छत पर एक कमरा डालता है, तो विभाग का पीला पंजा तुरंत पहुँच जाता है, लेकिन जब रसूखदार बिना CLU और बिना NOC के नेशनल हाईवे के किनारे ‘वॉटर बॉडी’ को निगल रहे हैं, तो अधिकारियों ने घुटने क्यों टेक दिए हैं?

क्या कानून सिर्फ गरीबों के लिए है? या फिर इन रसूखदारों के ‘घोसला’ पर भी कभी प्रशासन का डंडा चलेगा?

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