Saturday, May 30, 2026

UJJWAL DISHA: अंबाला नगर निगम चुनाव: नेता वो जो आपके सुख-दुख में दिखे, न कि सिर्फ पोस्टरों में बिके

अंबाला | लोकतंत्र की सबसे छोटी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई ‘नगर निगम’ होती है। यह वह प्रशासन है जो सीधे तौर पर नागरिक के रोजमर्रा के जीवन—सड़क, नाली, सफाई और स्ट्रीट लाइट—को प्रभावित करता है। लेकिन अंबाला नगर निगम चुनाव के मुहाने पर खड़े मतदाताओं के बीच आज सबसे बड़ी बहस यही है कि उन्हें ‘असली जनसेवक’ चाहिए या सिर्फ ‘पोस्टर वाला चेहरा’।

पोस्टर पॉलिटिक्स और जनता का भ्रम

आज वार्डों की दीवारों पर महंगे विनाइल पोस्टर और चमचमाते होर्डिंग्स की बाढ़ आ गई है। इन पोस्टरों में उम्मीदवार की मुस्कान तो बहुत गहरी है, लेकिन क्या वही गहराई उनके जन-सरोकारों में भी है? जनता को यह समझने की जरूरत है कि जो नेता केवल चुनाव के समय ‘विजिबल’ होता है, वह दरअसल जनसेवक नहीं, बल्कि एक ‘चुनावी सेल्समैन’ है। पोस्टर में छपी हाथ जोड़ने की मुद्रा अक्सर एक मार्केटिंग स्ट्रेटेजी का हिस्सा होती है, जिसका मकसद केवल सत्ता हासिल करना होता है।

सुख-दुख का साथी बनाम चुनाव का मेहमान

स्थानीय राजनीति का आधार ‘उपलब्धता’ (Availability) है। एक पार्षद की सबसे बड़ी योग्यता उसका धन नहीं, बल्कि संकट के समय जनता के लिए उपलब्ध होना है।

यदि कोई उम्मीदवार केवल चुनाव की घोषणा के बाद सफेद कुर्ते में गलियों की खाक छान रहा है, तो समझ लीजिए कि वह सुख-दुख का साथी नहीं, केवल ‘सत्ता का अभिलाषी’ है।

‘डम्मी’ और ‘रिमोट कंट्रोल’ उम्मीदवारों का संकट

अंबाला की राजनीति में ‘डम्मी’ उम्मीदवारों का चलन बढ़ रहा है। अक्सर पोस्टरों पर चेहरा किसी महिला या आरक्षित वर्ग का होता है, लेकिन पीछे की डोर किसी रसूखदार के हाथ में होती है। जनता को पूछना चाहिए—”अगर मेरी समस्या असली है, तो मेरा नेता ‘रबर स्टैंप’ क्यों?” क्या पोस्टर में बिकने वाला यह चेहरा सदन में आपके हक की आवाज उठा पाएगा?

धनबल बनाम जनबल

चुनाव प्रचार पर होने वाला बेतहाशा खर्च इस बात का संकेत है कि चुनाव को ‘सेवा’ नहीं बल्कि ‘निवेश’ मान लिया गया है। जो लाखों रुपये केवल प्रचार पर फूंक रहा है, उसकी पहली प्राथमिकता अक्सर उस निवेश को ‘रिकवर’ करना होती है, न कि वार्ड का विकास। इसके विपरीत, वह कार्यकर्ता जो वर्षों से बिना तामझाम के आपकी नालियां साफ करवाने और पेंशन बनवाने में लगा रहा, वही असली जननायक है।

जागरूक मतदाता की जिम्मेदारी

अंबाला की जनता को इस बार ‘पोस्टर’ की चमक और ‘पार्टी’ के शोर से ऊपर उठना होगा। लोकतंत्र विज्ञापनों से नहीं, विश्वास से चलता है। पोस्टर फाड़े जा सकते हैं, रंग फीके पड़ सकते हैं, लेकिन संकट के समय थामे गए हाथ की गर्माहट हमेशा याद रहती है।

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