Friday, May 29, 2026

UJJWAL DISHA: बढ़ती डीजल कीमतों से सहकारी बस संचालक परेशान, बोले—अब घाटे का सौदा बन रहा संचालन

अंबाला जिले में 76 सहकारी बसें विभिन्न रूटों पर संचालित, किराया न बढ़ने से आर्थिक संकट गहराया

अंबाला। देशभर में लगातार बढ़ रही पेट्रोल और डीजल की कीमतों का असर अब सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। खासकर सहकारी परिवहन समितियों द्वारा संचालित बसों के लिए मौजूदा हालात चुनौती बनते जा रहे हैं। बस संचालकों का कहना है कि बढ़ते ईंधन खर्च, वाहन रखरखाव और कर्मचारियों के वेतन के कारण बसों का संचालन धीरे-धीरे घाटे का सौदा बनता जा रहा है।

यदि अंबाला जिले की बात करें तो यहां सहकारी परिवहन समितियों की कुल 76 बसें विभिन्न रूटों पर संचालित हो रही हैं। इनमें 11 बसें अंबाला छावनी से नारायणगढ़, आठ बसें अंबाला शहर से नारायणगढ़ तथा करीब 20 बसें अंबाला छावनी से जगाधरी रूट पर चल रही हैं। इसके अलावा अंबाला शहर से पिंजौर, पंचकूला और अन्य स्थानीय व क्षेत्रीय मार्गों पर भी सहकारी समितियों की बसें यात्रियों को सेवाएं दे रही हैं।

डीजल महंगा, लेकिन किराया जस का तस

बस संचालकों का कहना है कि जब डीजल की कीमत करीब 68 रुपये प्रति लीटर थी, तब सरकार ने लोकल रूट पर चलने वाली बसों और अन्य वाहनों के किराए में वृद्धि की थी। इसके बाद अक्टूबर 2021 में जब पेट्रोल का दाम 103 रुपये और डीजल करीब 89 रुपये प्रति लीटर पहुंचा, तब भी किराए में बढ़ोतरी की गई थी।

लेकिन अब डीजल का रेट करीब 96 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच चुका है, बावजूद इसके अब तक बस किराए में किसी प्रकार की बढ़ोतरी नहीं की गई। इससे सहकारी बस संचालकों की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है।

बस संचालकों का कहना है कि मौजूदा किराया ढांचा पुराने ईंधन दरों के हिसाब से तय किया गया था, जबकि वर्तमान खर्च कई गुना बढ़ चुके हैं। ऐसे में बसों का संचालन करना मुश्किल होता जा रहा है।

अन्य राज्यों की तुलना में हरियाणा में किराया कम

सहकारी परिवहन समिति के सदस्य रामनाथ राणा ने बताया कि हरियाणा में डीजल की कीमतें अधिक होने के बावजूद बस किराया अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम है।

उन्होंने कहा कि हरियाणा में औसतन करीब एक रुपये प्रति किलोमीटर किराया लिया जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश में लगभग 1.30 रुपये प्रति किलोमीटर, पंजाब में 1.45 रुपये, हिमाचल प्रदेश में 1.50 रुपये और जम्मू-कश्मीर में करीब 1.40 रुपये प्रति किलोमीटर किराया लिया जा रहा है।

रामनाथ राणा का कहना है कि अन्य राज्यों में समय-समय पर किराए में संशोधन किया जाता है, लेकिन हरियाणा में लंबे समय से किराया नहीं बढ़ाया गया, जिससे सहकारी परिवहन समितियों पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ रहा है।

बढ़ते खर्चों ने बढ़ाई परेशानी

बस संचालकों के अनुसार केवल डीजल ही नहीं, बल्कि बसों के मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट्स, इंश्योरेंस, टैक्स और कर्मचारियों के वेतन जैसे खर्चों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

उन्होंने बताया कि पहले जहां एक बस के संचालन पर सीमित खर्च आता था, वहीं अब दैनिक संचालन लागत काफी बढ़ चुकी है। कई रूटों पर यात्रियों की संख्या कम होने के कारण आय और खर्च का संतुलन बिगड़ रहा है।

संचालकों का कहना है कि यदि जल्द ही किराए में संशोधन या सरकार की ओर से आर्थिक सहायता नहीं मिली तो कई रूटों पर बस संचालन प्रभावित हो सकता है।

सरकार से आर्थिक सहायता की मांग

रामनाथ राणा ने सरकार से मांग करते हुए कहा कि हरियाणा रोडवेज हर साल करीब 1000 करोड़ रुपये का घाटा उठाती है, जिसकी भरपाई सरकार द्वारा की जाती है। लेकिन सहकारी परिवहन समितियां भी जनता को लगातार परिवहन सेवाएं उपलब्ध करा रही हैं, बावजूद इसके उन्हें किसी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं मिलती।

उन्होंने कहा कि सहकारी बसें ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में लोगों के लिए महत्वपूर्ण यातायात साधन हैं। यदि इन बसों का संचालन प्रभावित होता है तो आम यात्रियों, छात्रों और नौकरीपेशा लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

रामनाथ राणा ने सरकार से अपील करते हुए कहा कि सहकारी बस संचालकों के लिए विशेष राहत पैकेज, डीजल पर सब्सिडी या किराए में संशोधन जैसी योजनाएं लागू की जानी चाहिए, ताकि वे भी सुचारु रूप से समाज की सेवा जारी रख सकें।

यात्रियों पर भी पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सहकारी परिवहन समितियों की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती रही तो भविष्य में कई बस रूट बंद होने की आशंका भी पैदा हो सकती है। इसका सबसे अधिक असर ग्रामीण क्षेत्रों के यात्रियों पर पड़ेगा, जहां निजी परिवहन के विकल्प सीमित हैं।

स्थानीय यात्रियों का कहना है कि सहकारी बसें आम जनता के लिए सस्ती और सुविधाजनक यात्रा का प्रमुख साधन हैं। ऐसे में सरकार को समय रहते इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

फिलहाल बस संचालकों की नजर सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है। अब देखना यह होगा कि सरकार किराए में बढ़ोतरी या किसी राहत योजना के जरिए सहकारी परिवहन समितियों को राहत देती है या नहीं।

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