धर्म डेस्क। हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी को सबसे पुण्यदायी एकादशियों में से एक माना जाता है। इस वर्ष यह पावन पर्व सिद्धि योग, शिव योग, स्वाति और विशाखा नक्षत्र के विशेष संयोग में मनाया जा रहा है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ गया है।
राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित विद्वान पंडित प्रेम कुमार शर्मा ने बताया कि एकादशी के दिन स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं। इस दिन व्रत, पूजा-पाठ और दान-पुण्य करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। उन्होंने बताया कि सामान्य तौर पर वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, जबकि अधिक मास पड़ने पर दो अतिरिक्त पुरुषोत्तम एकादशियां भी शामिल होती हैं।
पंडित शर्मा के अनुसार, निर्जला एकादशी को स्थानीय भाषा में ककड़िया एकादशी भी कहा जाता है। इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें श्रद्धालु पूरे दिन जल तक ग्रहण नहीं करते। महाभारत काल में भीमसेन सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते थे। तब उन्हें केवल निर्जला एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी गई थी, जिससे सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त हो सके। इसी कारण इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।
उन्होंने बताया कि इस दिन जलघट, पंखा, फल और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान अत्यंत फलदायी माना जाता है। साथ ही भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना, एकादशी महात्म्य का पाठ तथा “विष्णवे नमः” मंत्र का जाप करने से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
यह भी पढ़े: पलवल में भाजपा की प्रेस वार्ता, आपातकाल को बताया लोकतंत्र का काला अध्याय
पंडित प्रेम कुमार शर्मा ने कहा कि इस बार निर्जला एकादशी सिद्धि योग और शिव योग जैसे शुभ संयोगों से अलंकृत है। वहीं स्वाति और विशाखा नक्षत्र का प्रभाव इस पर्व की आध्यात्मिक महत्ता को और बढ़ा रहा है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत, भगवान विष्णु की आराधना और दान-पुण्य व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। इसी श्रद्धा और आस्था के साथ देशभर में श्रद्धालु निर्जला एकादशी का व्रत रख रहे हैं।
