अंबाला। नगर निगम चुनाव नजदीक हैं और हर गली-मोहल्ले में विकास के वादों की गूंज सुनाई दे रही है। लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है। अंबाला का वार्ड नंबर-8 इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है, जहां बुनियादी सुविधाएं आज भी लोगों के लिए संघर्ष का विषय बनी हुई हैं। झूलते बिजली के तार, सड़कों पर जमा गंदा पानी, ओवरफ्लो सीवरेज और गलियों में फैली गंदगी—यही इस वार्ड की पहचान बन चुकी है।
करीब 11,874 मतदाताओं वाले इस वार्ड में 6,109 पुरुष, 5,764 महिलाएं और एक अन्य मतदाता इस बार अपने प्रतिनिधि का चुनाव करेंगे। लेकिन यहां के लोगों के लिए चुनाव केवल वोट देने का अधिकार नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद भी है। वार्ड की सीमाएं जगाधरी गेट स्थित नगर निगम कार्यालय से आर्य चौक, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ चौक, महावीर पार्क, शुक्ल कुंड रोड, कुम्हार मोहल्ला, मां अंबिका मंदिर, पटेल रोड, पुरानी सब्जी मंडी रोड, गुरुनानक पुरा और दर्जी चौक तक फैली हुई हैं। इतना बड़ा क्षेत्र होने के बावजूद यहां विकास का असर न के बराबर नजर आता है।
सीवरेज और जल निकासी: सबसे बड़ी चुनौती
वार्ड नंबर-8 की सबसे गंभीर समस्या सीवरेज और जल निकासी की है। लगभग हर गली में सीवर ओवरफ्लो होना आम बात है। गंदा पानी सड़कों पर बहता रहता है, जिससे न केवल आवागमन में दिक्कत होती है बल्कि बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। बारिश के दिनों में हालात और भी बदतर हो जाते हैं।
स्थानीय निवासी बताते हैं, “बारिश आते ही पूरा इलाका तालाब बन जाता है। पानी घरों के अंदर तक घुस जाता है। कई बार हमें रातें बाहर बैठकर गुजारनी पड़ती हैं।” यह स्थिति सिर्फ एक घर की नहीं, बल्कि पूरे वार्ड की है।
कुम्हार मोहल्ले में जल निकासी की समस्या इतनी गंभीर है कि लोगों ने पिछले वर्ष कई दिनों तक धरना प्रदर्शन किया था। प्रशासन ने आश्वासन तो दिया, लेकिन आज तक कोई स्थायी समाधान नहीं हो पाया। स्टॉर्म वाटर पाइपलाइन की लेवलिंग को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। लोगों को यह तक नहीं पता कि पाइपलाइन से पानी की निकासी आखिर हो कहां रही है।
गंदगी और कूड़े के ढेर: बीमारी का खतरा
वार्ड में जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे हुए हैं, जो अवैध डंपिंग जोन में बदल चुके हैं। इनसे निकलने वाली बदबू और गंदगी न केवल वातावरण को दूषित करती है, बल्कि बीमारियों को भी न्योता देती है। रामकुमार, जिनकी दुकान पुराने कुएं के पास है, बताते हैं, “यहां हर समय गंदगी रहती है। नाले जाम रहते हैं और सीवरेज का पानी गलियों में भरा रहता है। कोई सुनने वाला नहीं है।”
ऐतिहासिक कुआं बना कूड़ेदान
कुम्हार मोहल्ले में अंग्रेजों के समय बना एक ऐतिहासिक कुआं आज बदहाली का शिकार है। यह कुआं कभी शहर को आग से बचाने के लिए बनाया गया था और इसकी देखरेख के लिए आर्मी से भी फंड आता है। लेकिन आज इसकी स्थिति यह है कि लोग इसे कूड़ेदान के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि इसके नीचे आज भी ट्यूबवेल मौजूद है।
यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण है, बल्कि शहर की विरासत के साथ हो रही अनदेखी को भी दर्शाता है।
बंद पड़ा सार्वजनिक शौचालय
मां अंबिका मंदिर के पास लाखों रुपये की लागत से बना सार्वजनिक शौचालय आज भी बंद पड़ा है। वर्षों पहले बनाए गए इस शौचालय का उद्घाटन तक नहीं हुआ। नतीजतन, लोगों को आज भी खुले में शौच करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
यह स्थिति उस समय और चिंताजनक हो जाती है जब सरकार स्वच्छता अभियान और खुले में शौच मुक्त भारत की बात करती है।
झूलते बिजली के तार: हादसे का खतरा
वार्ड में जगह-जगह बिजली के तार झूल रहे हैं, जो कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकते हैं। अशोक कुमार, जो एक चाय की दुकान चलाते हैं, कहते हैं, “तार इतने नीचे लटके हैं कि कभी भी स्पार्किंग हो जाती है। कई बार तो पटाखों जैसी आवाजें आती हैं। हमें हर समय डर बना रहता है।”
अतिक्रमण और संकरी गलियां
वार्ड की गलियों में अतिक्रमण की समस्या भी गंभीर है। दुकानों और घरों के बाहर बने थड़े नालियों की सफाई में सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं। नतीजतन, नालियां जाम रहती हैं और पानी का निकास नहीं हो पाता।
इसके अलावा, अंडरग्राउंड सीवरेज पाइपलाइन इतनी छोटी बनाई गई है कि थोड़ी सी गंदगी जाते ही जाम हो जाती है। इससे समस्या और बढ़ जाती है।
पेयजल संकट भी बड़ी समस्या
जहां एक तरफ गंदे पानी की भरमार है, वहीं साफ पेयजल की कमी भी लोगों को परेशान कर रही है। कई इलाकों में पानी की सप्लाई अनियमित है और लोगों को दूर-दूर से पानी लाना पड़ता है।
हर चुनाव में वादे, लेकिन काम नदारद
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर चुनाव में नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद कोई नजर नहीं आता। पिछले कई वर्षों से समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
अशोक कुमार कहते हैं, “हमने कई बार शिकायत की, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं हुआ। हर बार सिर्फ आश्वासन मिलता है।”
जनता का गुस्सा और उम्मीद
वार्ड नंबर-8 के लोग अब सिर्फ वादों से संतुष्ट नहीं हैं। इस बार वे जवाब चाहते हैं। लोगों का कहना है कि वे ऐसे प्रतिनिधि को चुनना चाहते हैं जो उनकी समस्याओं को समझे और उनका समाधान करे।
यह वार्ड इस बार सिर्फ वोट नहीं देगा, बल्कि अपने हक के लिए आवाज भी उठाएगा।

वार्ड नंबर-8 की स्थिति यह साफ दर्शाती है कि विकास के दावे और जमीनी हकीकत में कितना बड़ा अंतर है। जहां एक तरफ स्मार्ट सिटी और स्वच्छता अभियान की बातें हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि इस बार चुनाव में जनता किसे चुनती है—वादों को या काम करने वाले को। क्योंकि वार्ड नंबर-8 की जनता अब जाग चुकी है और इस बार उसका वोट बदलाव की दिशा तय कर सकता है।

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